(एक क्रिकेट फैन की कलम से सीधे दिल तक)
कल रात जब अहमदाबाद का आसमान नीली रोशनी से नहाया हुआ था, जब पूरा हिंदुस्तान जश्न में डूबा था, और जब सूर्या भाई (सूर्यकुमार यादव) ट्रॉफी उठा रहे थे... तो मेरी नज़रें भीड़ में एक इंसान को ढूँढ़ रही थीं। वो इंसान, जो इस पूरी जीत का सबसे शांत, सबसे खामोश और शायद सबसे ज़्यादा हक़दार था।
हाँ, मैं बात कर रहा हूँ संजू सैमसन की।
कल रात 89 रनों की वो 46 गेंदें... वो सिर्फ रन नहीं थे यार! वो 255 रनों के स्कोर में महज़ एक आंकड़ा नहीं था। वो संजू सैमसन के पिछले 10 सालों के दर्द, उनकी खामोशी, उनके ऊपर लगे 'बदनामी' के टैग्स और उन पर हँसने वालों को दिया गया एक 'करारा तमाचा' था। वो पारी नहीं, एक पूरी कहानी थी। एक ऐसी कहानी, जिसे कल रात संजू ने अपने बल्ले से लिखा और हम सब बस देखते रह गए।
'कंसिस्टेंट नहीं है'—उस एक टैग का दर्द
आपको याद है न? संजू सैमसन का नाम आते ही सबसे पहली चीज़ क्या दिमाग में आती थी? "टैलेंट बहुत है, लेकिन कंसिस्टेंट नहीं है।" एक मैच में 100 मारेगा, फिर चार मैच में ज़ीरो। यही तो कहा जाता था?
लेकिन क्या किसी ने सोचा कि एक खिलाड़ी के लिए ये टैग झेलना कितना मुश्किल होता है? जब उसे पता हो कि उसके पास गलतियों की कोई गुंजाइश नहीं है। जब उसे पता हो कि एक खराब शॉट और वो टीम से बाहर, फिर चाहे वो आईपीएल में कितने भी रन बना ले। संजू ने वो दर्द सालों तक झेला है। वो टीम में आए, बाहर गए, फिर आए, फिर बाहर गए... जैसे वो क्रिकेट नहीं, बल्कि म्यूज़िकल चेयर खेल रहे हों।
कल रात जब उन्होंने कीवी गेंदबाजों को रिमांड पर लिया, तो लगा जैसे वो हर उस 'टैग' को बाउंड्री के पार भेज रहे हों। वो जो एक कवर ड्राइव उन्होंने मारा... उफ्फ! उसमें वो 'कलास' (Class) थी जो सिर्फ संजू के पास है। वो जो उन्होंने सीधा छक्का जड़ा... उसमें वो ताकत थी जो उनके आलोचकों के मुँह बंद करने के लिए काफी थी।
वो 89 रन: एक ख़ामोश वापसी का शोर
संजू की वो पारी महज़ रनों की नहीं थी, वो उनकी 'वापसी' (Comeback) की कहानी थी।
कल रात संजू ने साबित कर दिया कि वो 'चोकर' नहीं हैं, वो 'मैच विनर' हैं। वो 'गिफ्टेड' प्लेयर हैं, जिसे कभी वो प्यार और भरोसा नहीं मिला, जिसका वो हक़दार था। उन्होंने 89 रन बनाकर वर्ल्ड कप फाइनल के इतिहास का सबसे बड़ा स्कोर बना दिया। क्या ये कम है?
'द संजू सैमसन फैक्टर': हमें उनसे क्या सीखना चाहिए?
संजू की ये कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं है, ये जिंदगी की कहानी है।
हम सब अपनी जिंदगी में कभी न कभी ऐसे दौर से गुज़रते हैं जब लोग हम पर हँसते हैं, जब हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है, जब हमारा टैलेंट दुनिया को नहीं दिखता। संजू ने हमें सिखाया कि जब दुनिया आप पर भरोसा न करे, तो आपको खुद पर भरोसा करना चाहिए। जब सब आपको गलत साबित करने पर तुले हों, तो आपको अपनी मेहनत से उन्हें सही साबित करना चाहिए।
संजू ने हमें सिखाया कि कामयाबी मिलने पर चिल्लाना ज़रूरी नहीं है, कभी-कभी खामोशी ही सबसे बड़ा शोर मचाती है।
तो संजू, ये जीत तुम्हारे लिए है!
कल रात भारत जीता, लेकिन मेरे लिए कल रात संजू सैमसन जीते। वो संजू सैमसन, जो 10 साल तक टीम में अपनी जगह के लिए लड़ता रहा। वो संजू सैमसन, जिसने कभी शिकायत नहीं की। वो संजू सैमसन, जिसने कल रात पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया।
हम सब चाहते हैं कि संजू आगे भी ऐसे ही खेलते रहें, ऐसे ही छक्के लगाते रहें और ऐसे ही हमें मुस्कुराने की वजह देते रहें।
तो अगली बार जब कोई संजू सैमसन को 'नॉन-कंसिस्टेंट' कहे, तो उन्हें कल रात की वो 89 रनों की पारी याद दिला देना। क्योंकि वो पारी नहीं, वो एक 'विश्व विजेता' की दहाड़ थी!
शाबाश, संजू! टीम इंडिया को तुम पर गर्व है!
अगर आप भी कल रात संजू की पारी देखकर इमोशनल हो गए थे, तो कमेंट्स में एक '❤️' ज़रूर छोड़ें और बताएं कि आपको संजू का सबसे अच्छा शॉट कौन सा लगा!